Initiation of inner change center

अन्तर्निरीक्षण

आदिमानव से आधुनिक मानव तक की मानव विकास यात्रा में, समृद्धि और संसाधनों में बहुत वृद्धि हुई है परंतु मानवीय समस्याएं यथावत हैं। संसार के बड़े भू-भाग पर रोटी, कपड़ा, मकान, मूलभूत स्वास्थ्य एवं पानी जैसी समस्याओं के हल करने के बाद अब हमारे पास अनाज के भंडार हैं, अच्छी सड़क, अच्छी यातायात व्यवस्था, अच्छी संचार व्यवस्था, अच्छी चिकित्सा व्यवस्था, स्वच्छ और सुंदर मकान आदि सब है, परंतु सुख-शांति, सामंजस्य सहकार सहयोग एवं आनंद की हमारी निर्विवाद सामूहिक आकांक्षा के बावजूद समाज में दुख, हिंसा, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, क्रूरता, बैर, लालच और तनाव बढ़ रहा है। मानव की इस विकास यात्रा में जानकारी की महत्वपूर्ण भूमिका है, परन्तु हम यह नहीं जानते हैं कि इसने व्यक्ति एवं समाज के साथ क्या किया है। हम समाज और व्यक्ति के अन्तर संबंधों को भी नहीं जानते हैं। इस बात के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि मानव और समाज में बहुत गहरा संबंध है। आइये हम मिल-जुलकर एक परख पड़ताल करें एवं देखें

    "मैं" (self) क्या है?
  • मानव समाज का निर्माता है और समाज मानव का निर्माता है। क्या यह कहा जा सकता है कि मैं(तुम) ही समाज हूँ और समाज ही मैं (तुम) है।
  • मनुष्य के परिवर्तन (निर्णय करने की प्रक्रिया) में जानकारी का स्थान क्या है?

अंर्तनिरीक्षण कार्यक्रम का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित अनुसार है:-

अन्तर्निरीक्षण कार्यक्रम मिलजुल कर स्वयं अनुभूत और अन्वेषित अनुभवों के आधार पर स्वयं सीखने का कार्यक्रम है। यह सभी तरह की वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक धारणाओं, सिद्धांतों एवं पूर्वाग्रहों से मुक्त है।

इसके लिए केन्द्र में ऐसा वातावरण उपलब्ध होगा जिसमें प्रतिभागी स्वयं अपना अन्वेषण कर सीख सकेंगे। अन्वेषण एवं समझ विकसित करने के लिए मूल रूप से हमें देखने (seeing), नेति (negation), अनुमान, संवाद (communication), अनुभव (experience) और अनुभूति (feelings) एवं साझा करण (sharing) की पद्धति का उपयोग करेंगे। मौन वार्ता हमारा प्रमुख उपकरण होगा।

अन्तर्निरीक्षण प्रारंभ करने के पूर्व यह तय करना जरुरी है कि प्रतिभागी परिवर्तन के लिए तैयार है।

Initiation of inner change center

सामान्य रूप से देखने, अवलोकन करने पर हमें अपने अस्तित्व के दो खण्ड मिलते हैं। एक हमारा शारीरिक स्वरूप और दूसरा हमारा चैतन्य स्वरूप।

इस स्वरुप को देखने समझने के लिए हमें किसी भी प्रकार के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, ये स्वयंसिद्ध है।

सामान्य बोलचाल में हम शरीर और संसार से संबंधों को अपना बाह्यखण्ड और चेतना को अपना आंतरिकखण्ड/अन्तःकरण बोलते हैं। सामान्य धारणा/मान्यता है, कि बाह्य खण्ड और अंतःकरण दो अलग-अलग हिस्से हैं। हम अवलोकन करेंगे कि क्या बाह्य खण्ड और आंतरिक खण्ड, दो स्वतंत्र खण्ड है या इनके सम्मिलन से हम पूर्ण होते हैं। मिलजुलकर इस बात पर भी गहनता पूर्वक अन्वेषण और अवलोकन करेंगे कि क्या वास्तव में हमारे दो खण्ड हैं? अथवा यह एक मात्र भ्रम है।

इन दोनों स्वरूपों के स्वस्थ विकास की आवश्यकताएं अलग-अलग है, जिनकी पूर्ति जरुरी है। इन्हें समझने के लिए शांत-वातावरण, स्वस्थ-विमर्श, तटस्थ-अवलोकन और गहन-अन्वेषण जरुरी है। कार्यक्रम में इन स्वरूपों में सामंजस्य प्राप्त करने की आवश्यकता को समझने का प्रयास भी किया जायेगा ।

कार्यक्रम के दौरान जानकारी (ज्ञान) और विचार का स्वरूप और उनका प्रभाव, गंभीरता, जवाबदारी, संवाद, सुनना, संबंध, मन की अव्यवस्था, मैं और संसार का स्वरूप, प्रेम, जीवन एवं मृत्यु इत्यादि, पर प्रश्न के माध्यम से स्व-अनुभूति के आधार पर अन्वेषण करेंगे और तर्क के आधार पर उनका स्वरूप देखेंगे।

हम ऐसा कोई आश्वासन या वादा नहीं करते हैं कि, आपको किसी प्रकार का मजा, हर्ष, खुशी, आमोद, आनंद (joy enjoyment jubilation bliss) अथवा सुख प्राप्त ही होगा, परंतु हमारे केंद्र के कार्यक्रम में कार्य के दौरान आपको निश्चित तौर पर ऐसे अनुभव अवश्य प्राप्त होंगे, जिनके माध्यम से आपके जीवन में परिवर्तन होने की संभावना बनेगी। हम आशा करते है कि, इस कार्यक्रमों में भाग लेने वाले प्रतिभागी अपने जीवन की अव्यवस्थाओं को समझ कर उन्हें दूर कर सकेंगे। प्रतिभागी कार्यक्रम के दौरान अपने लिए उपयुक्त विधि स्वयं विकसित करेंगे।